Saturday, December 30, 2017

बेहतर है हमारे सपनों का मर जाना

दुनिया भर की कविताएं बदल देने का वक़्त है
उन कविताओं से
जिनमें जीत नहीं
प्रेम नहीं
क्रांति की लपटें और
प्रतिशोध की ज्वाला नहीं
जिनमें सुरंग के उस पार
कोई रौशनी की किरण नहीं
जिनमें है तो बस
हार, मायूसी, निराशा,
हताशा
और उसके सारे पर्याय

कविताओं ने कभी कुछ नहीं बदला
प्रेम में कविता लिखने वाला कवि
बिना प्रेम मिले मर गया
क्रांति चाहने वाले को
गोलियों से भून दिया गया
तानाशाह के ख़िलाफ़ खड़ा कवि
सड़ने दिया गया ज़ेल में
जिस कवि ने जीने की बातें की थी
25 साल की उम्र में मर गया
और खून की उल्टियाँ करने वाला
बुढ़ापे तक जीता रहा
कविता ने अपने लिखने वालों को
कुछ भी तो नहीं दिया

मरने वाले को नोबेल नहीं चाहिए था
साल में दो दिन फेसबुक पर ट्रेंड नहीं होना था
अपने नाम पर साहित्यिक सम्मेलन,
फैन क्लब्स नहीं चाहिए थे
उस प्रेमी, क्रांतिकारी,
विद्रोही को,
जीने की चाह लिए उस लड़के और
उस सनकी बुड्ढे को
अपने-अपने दिलों में हुए गड्ढे भरने थे
और अपने जीते जी भरने थे
उनको तुम्हारे कमरे में पोस्टर बन
दीवार पर नहीं लटकना था

अब जरूरत है
उन सारी कविताओं को बदल देने की
जिनमें उन कवियों की चाहतें
आज भी जिंदा हैं और
साँसे ले रही हैं
जिन कविताओं में
उन कवियों की उम्मीद बाक़ी है
हम मुर्दा कौम हैं
अब जरूरत है
उन कविताओं को भी मार देने की
और ऐसी कविताओं से बदल देने की
जिनमें कोई कवि
कोई ख़्वाब नहीं पाले बैठा है
जिनमें किसी सनकी का विरोध या
विरोधाभास नहीं है
जरूरत है कि सारी कविताएँ
एक सी हो जायें
बिना किसी रंगीन दुनिया की चाहत के
कवि के मर जाने से पहले
उसके सपनों के मर जाने की जरूरत है

~ हिमांशु

(विरोधाभास - Paradox)

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