Saturday, October 28, 2017

मैं जाग रहा होऊंगा!

I.

जब ज़माने भर के लोग
अपने-अपने हिस्से की नींद सो रहे होंगे,
मेरी हम-नफ़स,
मैं जाग रहा होऊंगा।

तुम्हारे प्रेम में नहीं,
तुम्हारे इंतेज़ार में नहीं,
ना ही तुम्हारी तस्वीर को ताकता हुआ।

मेरी हम-नफ़स,
मैं जाग रहा होऊंगा,
इस आस में कि
अभी से थोड़ी देर पहले,
जब तुमने अपनी आँखें मूंदी होंगी,
तो जिस एक ख्याल ने
तुम्हारे होंठों पर,
हल्की सी एक मुस्कुराहट बिखेरी होगी,
वो ख़्याल मेरा रहा होगा,
और वो मुस्कुराहट मेरे लिए होगी।
तुम पर मैं कभी
अपना हक़ नहीं बता पाया,
पर तुम्हारी उस मुस्कुराहट पर
अपना अधिकार बताने के लिए,
मैं जाग रहा होऊंगा।

मेरी हम-नफ़स
मैं जाग रहा होऊंगा,
इस उम्मीद में मुस्कुराता हुआ कि,
आदतन,
नींद की आग़ोश में जाने से पहले
हज़ार बातों को अपने अंदर दबा कर,
बची-खुची जो भी बातें तुमने छांटी होंगी,
अपने हमराज़ से बताने के लिए,
उन बची-खुची बातों में मौजूद
उन बेशुमार किस्सों में,
कहीं एक ज़िक्र
मेरे नाम का होगा,
हमारे नाम का होगा,
जिस पर तुम अपनी मुस्कुराहट दबा लोगी,
अपनी उत्सुकता छुपा लोगी,
अपने उस हमराज़ से,
अपने सारे हमराज़ों से।
तुम्हारे उन्हीं उलझनों को जीता हुआ,
मैं जाग रहा होऊंगा।

मेरी हम-नफ़स
मैं जाग रहा होऊंगा,
इस इंतेज़ार में कि
अपने हिस्से की जो भी नींद
मैं अब तक तुम्हारे नाम जाग चुका हूँ,
उन नींदों का,
और उन अनगिनत रातों का,
जब मुझसे हिसाब मांगा जाएगा,
तो मैं उन रातों में तुम्हारे नाम लिखीं
वो सारी चिठ्ठियां खोल सकूँगा,
जो कभी मेरे कमरे से,
रात का अंधेरा चीर कर,
तुम तक ना पहुँच सकीं।
मैं तुम्हारे लिए लिखीं
अपनी वो सारी कविताएँ पढ़ सकूँगा,
जिनके अंत में,
या शुरू में,
मैं तुम्हारा नाम नहीं लिख पाया।
उन सारी चिट्ठियों,
और उन सारी कविताओं को, उनके
मुक़म्मल पते पर पहुँचाने के संघर्ष में,
ख़ुद से हारता-जीतता हुआ,
मैं जाग रहा होऊंगा।

तुम्हारे बार-बार कहने के बाद भी,
मेरी हम-नफ़स,
मैं जाग रहा होऊंगा।

मेरी हम-नफ़स,
मैं जाग रहा होऊंगा।

~ © Himanshu

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