Friday, January 12, 2018

सब ख़तरे में है!

तार पर बैठी कबूतर
रो रही है
कल किसी ने उसके साथी के डैने नोच डाले
सर काट के साथ ले गया
और उसके बच्चों को खा गया।
खून के लथपथ उसकी लाश को
उसके घोंसले से उठा कर
मैंने ही फ़ेंका था।
घोंसले में बिखरे उसके पंख
और उसके बच्चों की बीट
अभी साफ़ होनी बाक़ी है।
कबूतर तब से घोंसले में नहीं लौटी,
तार पर बैठी है।

किसी की हत्या हो गयी।
कोई सनकी बन फ़रार हो गया।

चार लोग
आत्मा की गवाही सुन
बचाने आये हैं।
कहते हैं सब ख़तरे में है।

सामने नाली में
सुअर
मस्त कीचड़ खा रहे हैं।

~ हिमांशु

प्रेम की तीन कविताएँ!

I.

तुम्हारी जरूरत
मेरे बिस्तर को नहीं,
मेरी बाजुओं को है।
जो ये खाली-खाली सा
महसूस होता रहता है,
मेरे सीने से तुम्हारे सीने
के टकराने पर ही भरेगा।
ये आँखें अब दुनिया की गंदगी
देखना नहीं,
तुम्हारी आँखों में देखना चाहती हैं।
ये आंसू जो अंदर रुके हैं,
तुमसे
लिपटने के बाद ही
पलकों की दहलीज़ लांघ
बाहर आएंगे।
मेरा कंधा
कभी तुम्हारे कंधे पर
टिकना चाहता है,
तो कभी
तुम्हें अपना सर टिकाने
कि जगह देना चाहता है।
मेरे होंठ,
तुम्हारे होंठों से पहले
तुम्हारी आंखें चूमना चाहते हैं।
मेरी उंगलियाँ,
तुम्हारे बालों से गुज़रने से पहले
तुम्हारी उंगलियों
का भरोसा जीतना चाहती हैं।
दिसंबर की किसी सर्द रात में,
तुम्हारे साथ
कहीं घूमने के बाद,
तुम्हें जाते देखने से पहले
मेरी साँसे,
तुम्हारे ठंडे और
ग़ुलाबी हो चुके चेहरे,
के एकदम पास जा कर
तुम्हारी साँसों में
मिल जाना चाहती हैं।

II.

मेरा बिखरा पड़ा कमरा
और मेरी थोड़ी सी
बिखरी हुई ज़िन्दगी
को तुम्हारी डाँट की दरकार है।
अटैची में रखी वो एक्स्ट्रा लार्ज शर्ट
और किचन में पड़ा कॉफ़ी मग
चाहते हैं कि
तुम उन्हें अपना लो।
किताबें इस उम्मीद में हैं
कि एकदिन उन्हें
तुम्हारे चश्में से पढ़ा जाएगा।
नीचे जो मैंने गद्दे बिछा रखे हैं,
उनको
हम दोनों को फ़िल्मी
होते देखना है।
तकियों को
ग़ैर-जरूरी होना है,
और ईयरफोन्स को शेयर।
फेसबुक को गॉसिप्स चाहिए,
इंस्टाग्राम को गोल्स!
व्हाट्सएप्प को इग्नोर होना है।
मेरे पड़ोसियों को
तुम्हें सीढ़ियों पर देख
मकानमालिक से शिकायत करनी है।
दिल्ली की सड़कें,
सीपी के सर्कल्स,
मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी,
मेट्रो के कैमरे,
सबको गवाह बनना है।
और जैसे मेरी बातों में
कब से बस तुम हो,
मुझे भी
कब से बस
तुम्हारा होना है।

III.

मैं
काफ़ी दूर खड़ा हूँ,
इन बातों से,
ऐसी उम्मीदों से।
आंखों के सामने समंदर है
जिसका अंत
मुझे नज़र नहीं आ रहा।
मेरे आसपास भीड़ है
उम्मीद में खड़े लोगों की,
नाउम्मीद हो चुके लोगों की,
सब इंतेज़ार में हैं
और समंदर को ताक रहे हैं।

समंदर की ठंडी हवाओं
का सुकून जला देने वाला है।
तुम्हारे लिए
मेरे प्रेम की तरह।

जलना,
इंतेज़ार करना,
प्रेम करना,
सब हिम्मत की बात है।

मैं काफ़ी दूर खड़ा हूँ
तुम्हारे प्रेम में,
तुम्हारे इंतेज़ार में,
जलता हुआ।

~ हिमांशु

Saturday, December 30, 2017

बेहतर है हमारे सपनों का मर जाना

दुनिया भर की कविताएं बदल देने का वक़्त है
उन कविताओं से
जिनमें जीत नहीं
प्रेम नहीं
क्रांति की लपटें और
प्रतिशोध की ज्वाला नहीं
जिनमें सुरंग के उस पार
कोई रौशनी की किरण नहीं
जिनमें है तो बस
हार, मायूसी, निराशा,
हताशा
और उसके सारे पर्याय

कविताओं ने कभी कुछ नहीं बदला
प्रेम में कविता लिखने वाला कवि
बिना प्रेम मिले मर गया
क्रांति चाहने वाले को
गोलियों से भून दिया गया
तानाशाह के ख़िलाफ़ खड़ा कवि
सड़ने दिया गया ज़ेल में
जिस कवि ने जीने की बातें की थी
25 साल की उम्र में मर गया
और खून की उल्टियाँ करने वाला
बुढ़ापे तक जीता रहा
कविता ने अपने लिखने वालों को
कुछ भी तो नहीं दिया

मरने वाले को नोबेल नहीं चाहिए था
साल में दो दिन फेसबुक पर ट्रेंड नहीं होना था
अपने नाम पर साहित्यिक सम्मेलन,
फैन क्लब्स नहीं चाहिए थे
उस प्रेमी, क्रांतिकारी,
विद्रोही को,
जीने की चाह लिए उस लड़के और
उस सनकी बुड्ढे को
अपने-अपने दिलों में हुए गड्ढे भरने थे
और अपने जीते जी भरने थे
उनको तुम्हारे कमरे में पोस्टर बन
दीवार पर नहीं लटकना था

अब जरूरत है
उन सारी कविताओं को बदल देने की
जिनमें उन कवियों की चाहतें
आज भी जिंदा हैं और
साँसे ले रही हैं
जिन कविताओं में
उन कवियों की उम्मीद बाक़ी है
हम मुर्दा कौम हैं
अब जरूरत है
उन कविताओं को भी मार देने की
और ऐसी कविताओं से बदल देने की
जिनमें कोई कवि
कोई ख़्वाब नहीं पाले बैठा है
जिनमें किसी सनकी का विरोध या
विरोधाभास नहीं है
जरूरत है कि सारी कविताएँ
एक सी हो जायें
बिना किसी रंगीन दुनिया की चाहत के
कवि के मर जाने से पहले
उसके सपनों के मर जाने की जरूरत है

~ हिमांशु

(विरोधाभास - Paradox)

Monday, November 27, 2017

सुरमें से लिखे तेरे वादे!

मैं जब भी ये गाना सुनता हूँ, और मैं ये गाना हर रोज़ सुनता हूँ, मुझे अफ़सोस होता है। दिल्ली शहर से मैंने खूब इश्क़ किया है, इस शहर को मैंने हद तक जिया है, लेकिन मैं इस दिल्ली शहर में इश्क़ नहीं कर पाया। मैं इस शहर में इश्क़ को नहीं जी पाया। ऐसा नहीं है कोशिश नहीं कि, पर असफल ही रहा। ना ये शहर कल का कल ख़त्म हो रहा है ना ही मैं, लेक़िन अब ये नाउम्मीदी आ गयी है कि इस शहर में कभी इश्क़ नहीं जी पाऊँगा। और मुझे अब कोई खास फ़र्क भी नहीं पड़ता पर जब ये गाना अपने अंत तक पहुँच रहा होता है और "तुझसे मिलना पुरानी दिल्ली में" वाली लाइन आती है तो एकदम से अंदर कहीं कुछ खटकने लगता है। लगता है अभी तो काफ़ी कुछ करना बाक़ी रह गया इस शहर में जिसके बिना अब तक जो भी किया सब अधूरा है। गुलज़ार साहब को ऐसा प्यारा गाना लिखने के लिए बद्दुआएं लगेंगी मेरी।

~ हिमांशु

Saturday, November 18, 2017

निशा!

मैंने कई रातों से दिन नहीं देखा। दरवाज़े के उस पार रौशनी है, चारों ओर उज़ाला ही उज़ाला है। मुझे रौशनी पसंद नहीं है, उज़ाले पसंद नहीं है। रौशनी अपने साथ दिन का शोर लाती है, दिन की चहलकदमी लाती है। मेरा सर फटता है रौशनी और उसके शोर में। रात में ऐसा नहीं होता। ऐसा नहीं है कि रात में शोर नहीं होता। रात चीख़ती है। पर रात सुनती भी है। दिन में कोई नहीं सुनता, दिन भी नहीं सुनता। सब बोलते जाते हैं, दिन भी बोलता जाता है। आपके भीतर भी कोई बोल रहा होता है, आप उसको नहीं सुनते। कई बार अकेले रास्तों पर सुन के अनसुना कर देते हैं। रात में आपके भीतर की आवाज़ें भी चीखने लगती है; रात में आप सुनते हैं। आप अपने भीतर की आवाज़ को क़ाबू में कर लेना चाहते हैं; नहीं कर पाते हैं तो ज़वाब ढूँढते हैं, उपाय ढूँढते हैं। रात को आपको समय देती है साहसी बन जाने का। रात आपको ख़ुद पर विजयी होना सिखाती है। रात के सन्नाटे में जब आप चीख़ते हैं तो रात सुनती है, जब रात चीख़ती है तो आप सुनते हैं। उज़ाला आंखों में चुभता है, अंधेरा कभी किसी की आँख में नहीं चुभा। रात के अकेलेपन में आप अकेले नहीं होते। आप के साथ आप होते हैं। दिन के उज़ाले में आप बस भीड़ का हिस्सा होते हैं। दिन में आप दुत्कारे जाते हैं, रात आपको क़रीब लाती है, खुद के, दूसरों के। रात प्यारी चीज़ है; रात प्यार करना सिखाती है, प्यार करने के मौके देती है। मैंने रात में जीना चुना है। मैंने रात को जीना चुना है।

~हिमांशु

Sunday, November 12, 2017

मैं असामान्य था!

मैं अब अपने ख़ात्मे की ओर अग्रसर हूँ। मैं अपने हिस्से का जल चुका; मैं अपने हिस्से की रौशनी जी चुका। अब धीरे-धीरे मेरे बुझ जाने का समय आएगा और मैं अपना अस्तित्व समेट के जा चुका होऊँगा। मेरे ख़त्म हो जाने के बाद जब मुझे याद किये जाने के लिये ऐसी कोई वज़ह नहीं बची होगी, मैं चाहता हूँ मुझे याद न किया जाए। मैं चाहता हूँ मैं जिस अंधेरे को ख़त्म करने की चाह में खुद ख़त्म हो गया वो बरकरार रहे, और मेरा वजूद और वो रौशनी जो मैंने खुद को जला कर पैदा की थी उस अंधेरे को ख़त्म करने के लिए, वो सब उसी अंधेरे में सिमट जाए। जब मैं जल रहा था, मैं कुछ भी हो जाने की क्षमता रखता था। मैं तुम्हारा सूरज हो सकता था, मैं जल कर भी असीमित सालों तक तुम्हें हर अंधेरे से बचा सकता था, मगर तुमने मेरा मुक़द्दर किसी सामान्य से तारे की तरह एकदिन जल कर गुमनामी में बुझ जाना तय किया। मैं तुम्हारे तय किये मुक़द्दर को ही अपना मुक़द्दर मान ख़त्म हो रहा हूँ।
मगर मैं चाहता हूँ जब अंधेरा मुझे पूरी तरह से खा चुका होगा तो तुम मेरी रौशनी का एक किरण संभाल कर रख लेना कहीं। जब अंधेरा तुम्हें भी खा जाएगा एकदिन, मैं चाहता हूँ मेरी रौशनी के उस एक किरण से तुम पूछो कि ऐसा क्यों हुआ कि इस अंधेरे से हम सब ही हार गए? क्या ये अंधेरा ही इस ब्रह्मांड का शाश्वत सत्य है?
मेरी रौशनी को किसी तरह का शाप था शायद। मैं जलता हुआ भी अंधेरे में ही था। मेरी रौशनी नकार दी गयी थी। मेरी रौशनी को भी अंधेरे का नाम दे दिया गया था। मैं अपने पूरे ज़ोर से जल कर भी अपने ऊपर लगा शाप नहीं हटा पाया था, अपनी रौशनी को रौशनी का नाम नहीं दिलवाया पाया था।
जब बुझते हुए तुम, अपने आख़िरी सवालात करोगे मेरी शापित रौशनी के संभाले गए उस आख़िरी किरण से, वो तुम्हें बताएगी कि कैसे मैं भी तुम्हारी तरह कुछ सवाल कर रहा था, कैसे मैं भी चीख़ रहा था, और जिस ज़वाब की तुम्हें अब दरकार है, मैं अपनी सारी उम्र जलता हुआ वही कह रहा था। तब मेरी सुनी नहीं गयी, मेरी रौशनी की तब अहमियत नहीं थी, क्योंकि तब तुम खुद रौशन थे और खुद को सूरज मान बैठे थे, तुम्हें लगा था तुम्हारी ऊर्ज़ा कभी ख़त्म नहीं होगी, अंधेरा तुम्हें कभी नहीं खायेगा। मेरी रौशनी की आख़िरी किरण तुम्हें बताएगी कि हर सूरज महज़ एक तारा है और एक दिन हर सूरज को हर आम तारे की तरह ही बुझ जाना है, इस अंधेरे को अपना मुक़द्दर मान लेना है। जैसे मैंने मान लिया था, तुम्हें भी मान लेना होगा। अंत में बस अंधेरा ही होगा, और कुछ नहीं।

मेरे रौशनी की आखिरी किरण तब कई फ़र्क पैदा कर देगी। तुम तुम्हारा सामान्य होना मान लोगे। मगर तब तुम्हें मेरे असामान्य होने का भी पता चल जाएगा। मैं सच में तुम्हारा सूरज होने की क्षमता रखता था। कभी ना ख़त्म होने वाला असीमित और असामान्य सूरज।

~ हिमांशु

Saturday, November 11, 2017

तुमसे मिलना!

आज जिस जगह पर मैं था, वहाँ मेरी जगह पर होना दुनिया में सबसे बुरी जगह पर होना था। वो लड़की जिस से आपको बेइंतेहा मोहब्बत है वो आपके सामने खड़ी है, और वो इतनी खूबसूरत लग रही है कि बस आप चाहते हों कि इस दुनिया का चलना, इस समय का आगे बढ़ना अभी के अभी रोक दिया जाना चाहिए ताकि आप बस उसको देख सकें और देखते रह सकें; तब तक जब तक आप उसे अपनी आँखों में भर लेने का ख़्वाब पूरा नहीं कर लेते या तब तक जब तक उसे देखते देखते आपकी जान नहीं चली जाती। आपने जो उसका रूप ख़्यालों में सोचा था वो उस से भी ख़ूबसूरत लग रही है; किसी कविता की तरह, किसी ग़ज़ल की तरह, मुझे नहीं पता किसकी तरह बस लग रही है और आप कुछ नहीं कर सकते। आप उसकी आँखों में देख कर उसे बता नहीं सकते कि उसको देख कर कितनी देर से आपकी सांसे थमी हुई हैं; आपने अपने ख़्यालों में हर रोज़ उसे सीने से लगाया है पर आज जब वो सामने है आप उसे छू कर ये भी नहीं पूछ सकते कि कहीं ये सब फ़िर से कोई ख़्याल ही तो नहीं। आप कुछ नहीं कर सकते सिवाए मलाल के। आप कुछ नहीं कर सकते सिवाए अपनी तक़दीर पर हँसने के। आप ना उसे पाने की चाह छोड़ सकते हैं ना उस से मोहब्बत करना और आप खुद से निराश होना भी नहीं बंद कर सकते। और आपकी मोहब्बत सामने है, इसीलिए आप हँसना भी नहीं छोड़ सकते। आप कुछ नहीं कर सकते सिवाए उस से और मोहब्बत करने के।
मोहब्बत में सौ तरह के दर्द होते होंगे पर अपने महबूब से मिल कर भी ना मिलने के दर्द से ज्यादा अफ़सोस भरा दर्द कोई भी नहीं। इत्तेफ़ाक़ से मुझे कुछ और मिला ना मिला हो, ये दर्द ख़ूब मिला है और मेरी क़िस्मत ऐसी है कि मैं इन इत्तेफाक़ों के बंद हो जाने की दुआएं भी नहीं माँग सकता क्योंकि मैं जी ही इन इत्तेफाक़ों के भरोसे रहा हूँ। मेरी जगह पर होना सबसे बुरी जगह पर होना है।

~ हिमांशु